ईरान में हालात दिन-ब-दिन और भयावह होते जा रहे हैं। इस्लामी गणराज्य के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई को सत्ता से हटाने की मांग को लेकर शुरू हुए हिंसक प्रदर्शनों ने अब व्यापक जनआंदोलन का रूप ले लिया है। सड़कों पर उमड़ी भीड़, सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई और लगातार बढ़ती मौतों की खबरें देश को एक गंभीर संकट की ओर धकेल रही हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, अब तक इन प्रदर्शनों में 2000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। मृतकों में बड़ी संख्या प्रदर्शनकारियों की बताई जा रही है, वहीं ईरानी सुरक्षा बलों के जवान भी हिंसा की चपेट में आए हैं। कई शहरों में झड़पें इतनी उग्र हो गई हैं कि हालात को काबू में करने के लिए कर्फ्यू और इंटरनेट पाबंदियों का सहारा लिया जा रहा है।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वर्षों से चली आ रही सख्त धार्मिक नीतियां, राजनीतिक दमन और आर्थिक बदहाली ने आम जनता का जीना दूभर कर दिया है। युवाओं और महिलाओं की भागीदारी इस आंदोलन को नई धार दे रही है। नारे, पोस्टर और सोशल मीडिया अभियानों के जरिए लोग खुलकर सत्ता के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं, हालांकि सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण सूचनाओं का प्रवाह सीमित हो गया है।
सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि यह आंदोलन “विदेशी ताकतों द्वारा प्रायोजित” है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहा है। इसी तर्क के आधार पर सुरक्षा बलों को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। कई इलाकों में गोलीबारी, गिरफ्तारियां और कथित मानवाधिकार उल्लंघन की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता भी बढ़ गई है।
संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों ने ईरान से संयम बरतने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की अपील की है। वहीं, ईरान के भीतर भय और अनिश्चितता का माहौल गहराता जा रहा है। अस्पतालों में घायलों की भीड़ है, परिवार अपने परिजनों की तलाश में भटक रहे हैं और देश का भविष्य सवालों के घेरे में खड़ा है।
कुल मिलाकर, ईरान इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर बीतता दिन हालात को और विस्फोटक बना रहा है। यह देखना बाकी है कि यह आंदोलन सत्ता परिवर्तन की दिशा में कोई निर्णायक मोड़ लेता है या फिर दमन के साए में और अधिक खून-खराबा देखने को मिलता है।