झारखंड के हजारीबाग जिले में वन भूमि पर हुए भीषण अवैध खनन का मामला अब केवल राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि केंद्र सरकार के संज्ञान में आते ही यह राष्ट्रीय स्तर का गंभीर मुद्दा बन गया है। करीब 156 हेक्टेयर वन क्षेत्र में अवैध खनन की पुष्टि होने के बावजूद जब लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए झारखंड सरकार को रिमाइंडर भेजा है।
केंद्र सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि इस मामले में अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जांच पूरी कर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
हजारीबाग जिले में वन भूमि पर अवैध खनन का यह मामला पहले ही CID जांच में प्रमाणित हो चुका है। जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि वन कानूनों, पर्यावरणीय नियमों और सरकारी दिशा-निर्देशों को दरकिनार कर बड़े पैमाने पर खनन किया गया ।
इसके बावजूद सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वन विभाग की ओर से अब तक कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया गया । न तो बड़े स्तर पर दोषियों की पहचान हुई, न ही मुख्य जिम्मेदारों पर कार्रवाई। इससे विभागीय कार्यशैली और संभावित मिलीभगत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
इस पूरे मामले में हजारीबाग के क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक (RCCF) की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे हैं। केंद्र सरकार ने RCCF पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को गंभीरता से लेते हुए झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि—
आरोपों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की जाए
दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए
जांच की प्रगति और निष्कर्ष की विस्तृत रिपोर्ट केंद्र को भेजी जाए
यह निर्देश साफ संकेत देता है कि अब सिर्फ फाइलों में मामला दबाने की कोशिश नहीं चलेगी।
यह मामला तब और तूल पकड़ गया जब हजारीबाग निवासी शनि कांत ने केंद्र सरकार के CPGRAMS (केंद्रीय लोक शिकायत निवारण प्रणाली) पोर्टल पर शिकायत
अवैध खनन की पुष्टि होने के बावजूद जानबूझकर कार्रवाई नहीं की गई
संबंधित अधिकारियों को ऊपर तक संरक्षण प्राप्त है
इसी वजह से पूरा मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया
इस शिकायत के बाद ही केंद्र सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए झारखंड सरकार से जवाब मांगा और रिमाइंडर जारी किया।
MoEFCC ने इस पूरे घटनाक्रम को पर्यावरण, कानून और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय मानते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि—
“वन भूमि पर अवैध खनन और भ्रष्टाचार किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।”
मंत्रालय ने झारखंड सरकार से अपेक्षा जताई है कि वह केवल औपचारिकता न निभाए, बल्कि जमीन पर ठोस और प्रभावी कार्रवाई कर उदाहरण पेश करे।
हजारीबाग जैसे वन-बहुल जिले में इस तरह का अवैध खनन न सिर्फ प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि जल स्रोतों, जैव विविधता और स्थानीय जीवन पर भी गहरा असर डाल रहा है।
पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्ती नहीं हुई, तो—
जंगल तेजी से खत्म होंगे
वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ेगा
आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़
केंद्र सरकार के कड़े रुख के बाद अब यह मामला झारखंड सरकार और वन विभाग की परीक्ष बन गया है। सवाल यही है—
क्या इस बार सच में दोषियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर मामला फिर से कागजी कार्रवाई और आश्वासनों में दबा दिया जाएगा?
यदि निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई होती है, तो यह मामला पूरे झारखंड में अवैध खनन के खिलाफ एक मजबूत नजीर बन सकता है।
अब देखना यह है कि 156 हेक्टेयर जंगल की इस लूट पर कब और कैसे कानून का शिकंजा कसता है।