सूर्य देव के धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते ही मकर संक्रांति का पावन पर्व शुरू हो गया। यह पर्व न केवल खगोलीय परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि ऊर्जा, उमंग और नई चेतना का संदेश भी देता है। धनबाद सहित पूरे कोयलांचल और आसपास के ग्रामीण इलाकों में मकर संक्रांति श्रद्धा, परंपरा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है।
इस वर्ष मकर संक्रांति दो दिवसीय होने के कारण स्नान-दान और पूजा-अर्चना के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ अपेक्षाकृत कम नजर आई। हालांकि, आस्था और उत्साह में किसी तरह की कमी नहीं दिखी। सुबह से ही लोग पवित्र नदियों, तालाबों और जलाशयों में स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देते नजर आए। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना हुई और भगवान सूर्य से सुख-समृद्धि व अच्छे स्वास्थ्य की कामना की गई।
कोयलांचल के ग्रामीण इलाकों में इस पर्व का खास महत्व है। घर-घर में तिल, गुड़, चूड़ा, दही और खिचड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। परिवार और पड़ोसियों के बीच इन व्यंजनों का आदान-प्रदान हुआ, जिससे आपसी सौहार्द और भाईचारे की भावना और मजबूत हुई। बच्चों और युवाओं में भी खासा उत्साह देखा गया, कहीं पतंगबाजी तो कहीं मेलों और छोटे-छोटे सांस्कृतिक आयोजनों ने पर्व की रौनक बढ़ा दी।
मकर संक्रांति को सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व माना जाता है, जिसे शुभ और मंगलकारी समय की शुरुआत के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि लोग इस दिन दान-पुण्य को विशेष महत्व देते हैं। कई जगहों पर जरूरतमंदों को वस्त्र, अन्न और अन्य आवश्यक सामग्री का वितरण भी किया गया।
कुल मिलाकर, दो दिवसीय मकर संक्रांति के बावजूद धनबाद और पूरे कोयलांचल क्षेत्र में पर्व का रंग पूरी तरह चढ़ा रहा। श्रद्धालुओं ने सादगी, विश्वास और उल्लास के साथ इस पर्व को मनाकर यह साबित कर दिया कि आस्था की गहराई भीड़ से नहीं, बल्कि मन के भाव से तय होती है।